Friday, August 9, 2013

अंतहीन-सी-इक-आशा

अंतहीन सी इक आशा लगी वो 
मेरे माथे को चूम के 
निकल पड़ी किसी की तलाश में 
कदमों को छूके उन्हें उड़ने की चाह देके 
निकल पड़ी किसी की तलाश में 

अंतहीन सी इक आशा लगी वो 
गुदगुदाती हुई, प्यार से इठलाती हुई 
आगे पढने की प्रेरणा दे चली वो 
दे चली मुझे चार पल की जिंदगानी 
लिख चली हथेली पे इक निशानी  

अंतहीन सी इक आशा लगी वो 
किल्कारती पुचकारती 
ख़्वाबों के पंख लगाके 
मेरे सपने बुनते हुए 
निकल पड़ी किसी की तलाश में 

मुस्कुराती खिलखिलाती 
अंगडाईयां लेती हुई
मेरे गालों को सहलाते हुए 
निकल पड़ी किसी की तलाश में 
वो अंतहीन सी  आशा

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